सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला-कमल मौला परिसर में बसंत पंचमी के पर्व और शुक्रवार की जुमा नमाज को शांति और अनुशासन के साथ आयोजित करने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। यह परिसर लंबे समय से धार्मिक पहचान के विवाद का केंद्र रहा है, जहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय दोनों अपनी पूजा-अर्चना के लिए इसे विशेष मानते हैं।
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमलया बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की खंडपीठ ने की। सुनवाई एक आवेदन पर आधारित थी, जिसे हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस द्वारा दाखिल किया गया था। इसमें 23 जनवरी 2026 को परिसर में पूरे दिन बसंत पंचमी पूजा-अर्चना करने की अनुमति मांगी गई थी।
भोजशाला परिसर, जो 11वीं शताब्दी का ऐतिहासिक स्मारक है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित है, हिंदू समुदाय के लिए देवी सरस्वती (वाग्देवी) को समर्पित मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमल मौला मस्जिद के रूप में मानता है।
2003 के समझौते के अनुसार, परिसर में मंगलवार को हिंदू पूजा-अर्चना कर सकते हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को जुमा नमाज के लिए अनुमति दी गई है। इस व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोनों समुदायों के धार्मिक अधिकारों और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश दिए।
सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष के वकील ने बताया कि बसंत पंचमी पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा, हवन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाएंगे। वहीं मस्जिद समिति ने यह स्पष्ट किया कि जुमा नमाज का समय 1 बजे से 3 बजे तक है और इसे आगे-पीछे नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि नमाज संपन्न होने के तुरंत बाद नमाजी परिसर खाली कर देंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए सुझाव स्वीकार किया कि परिसर में अलग-अलग, स्पष्ट रूप से चिन्हित क्षेत्र बनाए जाएं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि 1 बजे से 3 बजे तक नमाज के लिए एक अलग प्रवेश और निकास के रास्ते वाले विशेष क्षेत्र का प्रावधान किया जाए। इसके साथ ही हिंदू समुदाय के लिए बसंत पंचमी अनुष्ठानों का अलग स्थान सुनिश्चित किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मस्जिद समिति प्रशासन को पहले से अपेक्षित नमाजियों की संख्या बताए, ताकि प्रशासन आवश्यक पास जारी कर सके या अन्य सुरक्षा उपाय सुनिश्चित कर सके। केंद्र सरकार, ASI और मध्य प्रदेश सरकार ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। कोर्ट ने दोनों पक्षों से अपील की कि वे प्रशासन का पूरा सहयोग करें और परिसर में शांति बनाए रखने के लिए परस्पर सम्मान दिखाएं।
यह मामला मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी, धार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) से उत्पन्न हुआ। याचिका में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें ASI को भोजशाला-कमल मौला परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया गया था।
अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने सर्वेक्षण को जारी रखने की अनुमति दी थी, लेकिन किसी भी प्रकार की खुदाई या संरचना के स्वरूप को बदलने वाले कदमों पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बिना उसकी अनुमति के सर्वेक्षण की रिपोर्ट के आधार पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती।
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को निस्तारित करते हुए हाई कोर्ट के मुख्य याचिका को सुनवाई के लिए वरिष्ठ जज की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच को सौंपने के निर्देश दिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि ASI ने सर्वेक्षण पूरा कर लिया है और अपनी रिपोर्ट सील बंद लिफाफे में जमा कर दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट रिपोर्ट का सील खोले और दोनों पक्षों को प्रतियां उपलब्ध कराए, ताकि वे आपत्तियां दाखिल कर सकें। यदि रिपोर्ट का कोई हिस्सा सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है, तो पक्षों को अपने वकीलों की मौजूदगी में निरीक्षण की अनुमति दी जाए। हाई कोर्ट को कहा गया कि अंतिम सुनवाई में सभी आपत्तियां, सुझाव और सिफारिशें ध्यान में रखी जाएं।
इस विवाद में कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि धार्मिक स्वतंत्रता, ऐतिहासिक महत्व और कानून का पालन समान रूप से हो। कोर्ट के आदेश का उद्देश्य दोनों समुदायों के धार्मिक अधिकारों का सम्मान करना और परिसर में शांति बनाए रखना है।
भोजशाला-कमल मौला परिसर विवाद भारतीय न्याय प्रणाली और सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह मामला दर्शाता है कि कैसे संवेदनशील धार्मिक स्थलों पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाकर कानून और व्यवस्था बनाए रखी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से उम्मीद जताई जा रही है कि 23 जनवरी को बसंत पंचमी और शुक्रवार की नमाज दोनों समुदायों के लिए सुरक्षित और शांतिपूर्ण ढंग से आयोजित की जाएंगी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में प्रशासनिक और सुरक्षा उपायों के अलावा यह भी स्पष्ट किया गया कि दोनों पक्षों को एक-दूसरे का सम्मान करना आवश्यक है। इसके साथ ही कोर्ट ने समुदायों और प्रशासन के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देने का मार्ग भी सुनिश्चित किया।
यह दिशा-निर्देश न्यायिक संतुलन, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक के रूप में देखे जा सकते हैं। ASI का सर्वेक्षण, दोनों समुदायों के अधिकारों और परिसर की ऐतिहासिक पहचान की रक्षा के लिए एक वैज्ञानिक और निष्पक्ष आधार प्रदान करेगा।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह सुनिश्चित होगा कि भोजशाला-कमल मौला परिसर में धार्मिक कार्यक्रमों के दौरान किसी भी प्रकार की हिंसा या तनाव की संभावना न्यूनतम रहे। प्रशासन और दोनों समुदायों का सहयोग इसे सफल बनाने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
न्यायपालिका विवादों का समाधान करते समय संवेदनशील और संतुलित दृष्टिकोण अपनाती है। इतिहास, धर्म और संस्कृति के प्रति सम्मान बनाए रखते हुए कानून का पालन सुनिश्चित करना ही इस फैसले का मूल उद्देश्य है।