नेपाल में हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों की आग अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि अब यूरोप के एक बड़े देश फ्रांस में भी जनता सड़कों पर उतर आई है। यहाँ राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार की नीतियों और लगातार बढ़ते राजनीतिक संकट को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं। 10 सितंबर को पेरिस समेत कई शहरों में ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ नामक राष्ट्रीय आंदोलन के तहत हजारों लोग सड़कों पर उतरे।
बजट कटौती बनी वजह
फ्रांस में विरोध की शुरुआत 15 जुलाई को तब हुई जब प्रधानमंत्री फ्रांस्वा बायरू ने संसद में राष्ट्रीय बजट पेश किया। सरकार ने 2026 के लिए खर्चों को 4.38 करोड़ यूरो (करीब 452 करोड़ रुपये) घटाने का प्रस्ताव रखा। इसके साथ ही तीन महत्वपूर्ण कल्याणकारी योजनाओं को समाप्त करने की बात कही गई। जनता इसे लेकर महीनों से असंतुष्ट थी और सोशल मीडिया पर विरोध की तैयारी चल रही थी। जैसे ही यह बजट सार्वजनिक हुआ, सोशल मीडिया पर Boycott, désobéissance et solidarité (बहिष्कार, अवज्ञा और एकजुटता) के नारे वायरल होने लगे।
‘ब्लॉक एवरीथिंग’ आंदोलन
इन्हीं नाराजियों के बीच 10 सितंबर को ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ नामक राष्ट्रीय आंदोलन का ऐलान हुआ। इस आंदोलन का मकसद था सरकार की नीतियों के विरोध में शहरों को ‘जहां-तहां रोक देना’। प्रदर्शन फिलहाल सिर्फ एक दिन के लिए तय था, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर समर्थन मिला। राजधानी पेरिस समेत कई शहरों में परिवहन सेवाओं और सड़कों पर असर देखने को मिला।
कौन कर रहा है अगुवाई?
इन प्रदर्शनों की अगुवाई ‘द सिटिजन कलेक्टिव’ नामक संगठन कर रहा है। इसमें करीब 20 आयोजक जुड़े हैं। यह संगठन खुद को राजनीतिक दलों और व्यापारिक संगठनों से स्वतंत्र बताता है। इसके सोशल मीडिया हैंडल्स पर लोग #10septembre2025 और #10septembre जैसे हैशटैग्स के साथ पोस्ट कर रहे हैं।
सरकार पर असर और विश्वास मत
जैसे-जैसे 10 सितंबर के विरोध की चर्चा बढ़ी, सरकार को भी इसका अंदाजा हो गया। अगस्त के आखिरी हफ्तों में प्रधानमंत्री बायरू ने संसद में सरकार और बजट को लेकर विश्वास मत लाने की घोषणा की। 8 सितंबर को वोटिंग हुई लेकिन बायरू विश्वास मत हासिल नहीं कर पाए। नतीजा यह हुआ कि सरकार की योजनाएं अधर में लटक गईं और प्रधानमंत्री ने इस्तीफे की पेशकश कर दी।
जब सरकार गिर गई तो फिर प्रदर्शन क्यों?
क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी, लंदन के इतिहासकार एंड्रयू स्मिथ के मुताबिक 8 सितंबर को सरकार गिरने के बाद लोगों का गुस्सा केवल बजट तक सीमित नहीं रहा। अब जनता आर्थिक संकट के साथ-साथ दो साल से जारी राजनीतिक अस्थिरता को लेकर भी नाराजगी जता रही है। 2024–25 के बीच राष्ट्रपति मैक्रों को सरकार चलाने के लिए पांचवें प्रधानमंत्री तक नियुक्त करना पड़ा। संसद में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है, जिससे स्थायी नेतृत्व तय नहीं हो पा रहा है।
राजनीतिक संकट गहराता क्यों जा रहा है?
फ्रांस में वर्तमान में स्थिति कुछ इस तरह है: वामपंथी दल सीटों के लिहाज से आगे हैं। राष्ट्रपति मैक्रों के समर्थक दलों (रेनेसां, मोडेम और होराइजन्स) ने गठबंधन किया है। कुछ दक्षिणपंथी दलों ने लेफ्ट को सत्ता से दूर रखने के लिए मैक्रों को समर्थन दिया। लेकिन इतनी जोड़-तोड़ के बावजूद सरकार स्थिर नहीं हो पा रही। इससे नीतियां अटक रही हैं और जनता का भरोसा टूट रहा है।
आर्थिक और सामाजिक असर
बजट कटौती का सीधा असर आम लोगों पर पड़ने वाला था। कल्याणकारी योजनाएं खत्म होने से गरीब और मध्यमवर्गीय नागरिक प्रभावित होते। पेंशन, सब्सिडी और सामाजिक सहायता जैसे प्रावधानों में कमी से असंतोष बढ़ा। ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ आंदोलन में श्रमिक संगठनों, छात्रों और साधारण नागरिकों ने भी भाग लिया।
फ्रांस में मौजूदा हालात
पेरिस और अन्य शहरों में ट्रैफिक और सार्वजनिक परिवहन सेवाएं बाधित हुईं। कई सरकारी दफ्तरों और संस्थानों के बाहर प्रदर्शनकारी इकट्ठा हुए। पुलिस ने कुछ जगहों पर हल्का बल प्रयोग भी किया लेकिन माहौल अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा।
फ्रांस में ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ आंदोलन केवल बजट कटौती का विरोध नहीं है, बल्कि यह जनता के बढ़ते असंतोष और राजनीतिक अस्थिरता की झलक भी है। लगातार बदलती सरकारें और अधूरी नीतियां लोगों के भरोसे को कमजोर कर रही हैं। ऐसे में यह आंदोलन राष्ट्रपति मैक्रों और उनके सहयोगियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।