पाकिस्तान इस समय अपनी स्वतंत्रता के बाद के सबसे कठिन आर्थिक दौर से गुजर रहा है। देश पर कर्जों का बोझ लगातार बढ़ रहा है विदेशी मुद्रा भंडार निचले स्तर पर है और महंगाई आम नागरिक की कमर तोड़ चुकी है। इसके बावजूद, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसने पाकिस्तान की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों में नई बहस छेड़ दी है। सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की बढ़ती ताकत के बीच सरकार ने सेना के लिए 50 अरब रुपये का अतिरिक्त बजट जारी कर दिया है। आलोचक इसे सरकार द्वारा “सेना के आगे घुटने टेकने” के रूप में देख रहे हैं।
पाकिस्तान सरकार पहले ही चालू वित्त वर्ष में रक्षा खर्च के लिए 2.55 ट्रिलियन रुपये का बड़ा प्रावधान कर चुकी है जो देश की कुल अर्थव्यवस्था के आकार और मौजूदा वित्तीय स्थितियों को देखते हुए अत्यधिक माना जा रहा है। इसके अलावा विश्लेषकों का कहना है कि सैन्य पेंशन के लिए करीब 1 ट्रिलियन रुपये अलग से रखे गए हैं। सरकार के बयान के अनुसार यह अतिरिक्त 50 अरब रुपये मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की मजबूत सुरक्षा, नेवल बेस की क्षमता बढ़ाने और चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (CPEC) की सुरक्षा ढांचे को और सुदृढ़ करने के लिए जारी किए गए हैं। हालांकि, विश्लेषकों की मानें तो यह व्याख्या केवल औपचारिकता है क्योंकि इस राशि का सबसे बड़ा हिस्सा पाकिस्तानी थल सेना को मिलने वाला है।
जानकारी के मुताबिक, 50 अरब रुपये में से केवल 11 अरब रुपये नौसेना को दिए जाएंगे जबकि बाकी राशि जनरल असीम मुनीर के नेतृत्व वाली सेना को दी जाएगी। यह फैसला पाकिस्तानी कैबिनेट की आर्थिक समन्वय समिति द्वारा लिया गया जिसकी अध्यक्षता वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगज़ेब ने की। समिति की बैठक के बाद जारी आधिकारिक बयान में कहा गया कि यह बजट “रक्षा सेवाओं के प्रोजेक्ट्स” की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए है। इस बात पर कोई स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया कि किन प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता दी जाएगी।
पाकिस्तान के आर्थिक हालात इस समय बेहद खराब हैं। देश लगातार पुराने कर्जों को चुकाने के लिए नए कर्ज लेने की नीति अपनाने पर मजबूर है। आईएमएफ के सख्त नियम, टैक्स बढ़ोत्तरी, पेट्रोल-डीजल के ऊंचे दाम और खाद्य वस्तुओं की महंगाई ने आम जनता का जीवन मुश्किल बना दिया है। ऐसे समय में सेना को इतना बड़ा अतिरिक्त बजट जारी करने को कई विशेषज्ञ तर्कहीन बताते हैं। उनका कहना है कि जब सरकारी खजाना खाली हो, महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर हो और बेरोजगारी बढ़ रही हो तब विकास योजनाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य की बजाय सेना पर इतना पैसा खर्च करना सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है।
तो वहीं कई विश्लेषकों का यह भी मानना है कि पाकिस्तान की राजनीति में सेना की पकड़ हमेशा से मजबूत रही है लेकिन असीम मुनीर के कार्यकाल में यह दखल पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। उनका तर्क है कि सरकार आर्थिक तौर पर इतनी कमजोर हो चुकी है कि उसके पास सेना के फैसलों को चुनौती देने की क्षमता नहीं बची है। इसलिए यह बजट सिर्फ सुरक्षा या रक्षा जरूरतों से अधिक “शक्ति संतुलन” का मामला है। दूसरी ओर, सरकार समर्थकों का कहना है कि पाकिस्तान की सीमाएं लगातार खतरों का सामना करती हैं और CPEC जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट की सुरक्षा राष्ट्रीय हित में है। चीन द्वारा बार-बार सुरक्षा को लेकर जताई जा रही चिंता भी इस फैसले के पीछे एक बड़ा कारण मानी जा रही है। पाकिस्तान की मौजूदा परिस्थितियों में यह निर्णय एक बार फिर यह दर्शाता है कि देश में वास्तविक शक्ति केंद्र कौन है। आर्थिक बदहाली के बावजूद सेना को प्राथमिकता देने से यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान की सियासत और शासन व्यवस्था में सेना की भूमिका फिलहाल और मजबूत होती जा रही है |