बांग्लादेश की राजनीति में तीन दशकों से चला आ रहा एक ऐतिहासिक अध्याय अब समाप्ति की ओर बढ़ता दिख रहा है। देश की पहली महिला प्रधानमंत्री खालिदा जिया के 80 वर्ष की उम्र में निधन के साथ ही बांग्लादेश की सत्ता संरचना में बड़ा बदलाव तय माना जा रहा है। खालिदा जिया और शेख हसीना—इन दो महिला नेताओं ने पिछले 30 से अधिक वर्षों तक बांग्लादेश की राजनीति को दिशा दी, उसे स्थिर भी किया और कई बार गहरे संकटों में भी डाला। अब खालिदा जिया के निधन और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के राजनीतिक निर्वासन में होने के कारण यह महिला वर्चस्व वाला दौर खत्म होता नजर आ रहा है, और संकेत मिल रहे हैं कि देश को 30 साल बाद एक पुरुष प्रधानमंत्री मिल सकता है। खालिदा जिया के जाने से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) में उत्तराधिकार की बहस तेज हो गई है और उनके बेटे तारिक रहमान को पार्टी का संभावित प्रधानमंत्री चेहरा माना जा रहा है। अगर राजनीतिक घटनाक्रम अपेक्षित दिशा में आगे बढ़ता है, तो तारिक रहमान का उभार तय माना जा रहा है।
1991 से लेकर अब तक बांग्लादेश की लोकतांत्रिक राजनीति लगभग पूरी तरह एक ही धुरी पर घूमती रही—खालिदा जिया बनाम शेख हसीना, यानी बीएनपी बनाम अवामी लीग। चुनाव, आंदोलन, शासन, विदेश नीति और संस्थानों की साख तक इस प्रतिद्वंद्विता से प्रभावित रही। ‘बैटलिंग बेगम्स’ के नाम से मशहूर इन दोनों नेताओं ने न सिर्फ सत्ता में बारी-बारी से शासन किया, बल्कि लंबे समय तक सत्ता पर लगभग एकाधिकार बनाए रखा। उनकी राजनीतिक सोच, नेतृत्व शैली और आपसी व्यक्तिगत दुश्मनी ने देश की राजनीति की लय तय की। इस प्रतिद्वंद्विता की जड़ें इतिहास में गहराई से जुड़ी हैं। खालिदा जिया के पति और तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर रहमान की 1981 में हत्या हुई थी, जबकि शेख हसीना के पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की 1975 में हत्या कर दी गई थी।
इन व्यक्तिगत त्रासदियों ने दोनों नेताओं को राजनीति में मजबूत किया, लेकिन समय के साथ यह राजनीतिक संकल्प कठोर प्रतिशोध में बदलता चला गया। शासन की जगह बदले की राजनीति हावी होती गई, संवाद की जगह टकराव और समझौते की जगह प्रताड़ना ने ले ली। नतीजा यह हुआ कि बांग्लादेश की लोकतांत्रिक व्यवस्था हमेशा सक्रिय तो रही, लेकिन कभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो सकी। खालिदा जिया का निधन केवल एक नेता के जाने का संकेत नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में एक दुर्लभ राजनीतिक प्रयोग—लगातार महिला प्रधानमंत्रियों के शासन—का अंत भी है। दिलचस्प बात यह रही कि महिला नेतृत्व के बावजूद देश में पितृसत्तात्मक राजनीति कमजोर नहीं पड़ी, बल्कि व्यक्तिवादी और वंशवादी राजनीति और मजबूत होती चली गई। अब जब शेख हसीना सत्ता से बाहर और निर्वासन में हैं तथा खालिदा जिया का निधन हो चुका है, तो दशकों पुरानी यह राजनीतिक जोड़ी टूट चुकी है। यह सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता के ढांचे में बड़े पुनर्गठन का संकेत है। इतिहास में दोनों नेताओं के बीच सहयोग का एकमात्र दौर तब आया था जब उन्होंने 1980 के दशक के अंत में सैन्य शासक हुसैन मोहम्मद इरशाद के खिलाफ संयुक्त आंदोलन का नेतृत्व किया था।
लेकिन लोकतंत्र बहाल होते ही यह एकता टूट गई और इसके बाद बांग्लादेश की राजनीति लगभग शून्य-योग खेल बन गई, जहां हार का मतलब था जेल, निर्वासन या राजनीतिक हाशिए पर धकेल दिया जाना। सत्ता से बाहर होते ही नेताओं और उनके परिवारों के देश छोड़ने का सिलसिला भी आम हो गया। शेख हसीना का बेटा अमेरिका में रहा, जबकि खालिदा जिया का बेटा तारिक रहमान ब्रिटेन में। दोनों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और दोनों ही ऐसे प्रतीक बन गए, जहां नेतृत्व देश से बाहर रहकर भी भीतर से निष्ठा की अपेक्षा करता रहा।
अब खालिदा जिया के निधन के बाद बीएनपी में नेतृत्व का रास्ता साफ होता दिख रहा है। तारिक रहमान को पार्टी का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जा रहा है और उनकी संभावित वापसी को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है। अगर वे सक्रिय राजनीति में पूरी तरह लौटते हैं, तो यह न केवल सत्ता परिवर्तन होगा, बल्कि बांग्लादेश में तीन दशकों बाद एक पुरुष प्रधानमंत्री के उभरने का रास्ता भी खोलेगा। हालांकि असली सवाल सिर्फ लिंग का नहीं है, बल्कि यह है कि क्या बांग्लादेश अब वंश और विरासत की राजनीति से आगे बढ़ पाएगा, या फिर बेगमों की जगह उनके वारिस सत्ता संभालेंगे। रानियां मंच से उतर चुकी हैं, लेकिन राजवंश की राजनीति अभी भी पर्दे के पीछे इंतजार करती दिख रही है।