नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति पद के चुनाव को लेकर देशभर में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्षी गठबंधन इंडी पर तीखा हमला बोला है। शाह ने कांग्रेस और विपक्ष की ओर से उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी को मैदान में उतारने पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह फैसला नक्सलियों का समर्थन करने जैसा है।
गृह मंत्री ने कहा कि यह चुनाव “साउथ बनाम साउथ” की तरह नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा है। शाह ने चेताया कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने एक ऐसे व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया है, जिनका रिकॉर्ड नक्सलवाद समर्थक के रूप में जाना जाता है।
शाह का सीधा हमला: “वामपंथी नक्सलियों के समर्थक को उम्मीदवार बनाया”
अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने यह दिखा दिया है कि वह वामपंथी दबाव में काम कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सुदर्शन रेड्डी ने अपने फैसलों से नक्सलवाद को कमजोर करने के बजाय और मजबूत किया। शाह बोले, “देश का उपराष्ट्रपति किसी भी राज्य से हो सकता है। इसे साउथ बनाम साउथ की लड़ाई कहना बिल्कुल गलत है। यह कदम केवल कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी का परिणाम है।”
केरल में कांग्रेस की संभावना खत्म
शाह ने कांग्रेस को चेताते हुए कहा कि इस फैसले का सबसे बड़ा असर केरल की राजनीति पर पड़ेगा। उन्होंने कहा, “कांग्रेस की केरल में जो थोड़ी बहुत उम्मीदें बची थीं, वे भी अब खत्म हो गई हैं। केरल की जनता देखेगी कि कांग्रेस ने वामपंथी नक्सल समर्थक नेता को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है।
सलवा जुडूम का जजमेंट और विवाद
यह विवाद दरअसल 2011 के सुप्रीम कोर्ट जजमेंट से जुड़ा है। उस समय न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी ने सलवा जुडूम पर फैसला सुनाया था।
जजमेंट में क्या कहा गया था?
राज्य सरकारें माओवादी विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई में आदिवासी युवकों को विशेष पुलिस अधिकारी (SPO) के रूप में इस्तेमाल कर रही थीं। इन युवकों को ‘कोया कमांडो’ या ‘सलवा जुडूम’ के नाम से जाना जाता था। न्यायमूर्ति रेड्डी ने आदेश दिया कि यह प्रथा गैरकानूनी और असंवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन्हें तुरंत निरस्त्र किया जाए। अमित शाह का कहना है कि अगर यह फैसला न हुआ होता तो साल 2020 तक नक्सलवाद का सफाया हो गया होता।
शाह का तर्क: “नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई रोकी गई”
गृह मंत्री ने कहा कि यह फैसला विचारधारा से प्रभावित था और इससे नक्सलवाद की कमर टूटने की बजाय और मजबूत हुई। उन्होंने कहा: “केरल ने नक्सलवाद का दंश झेला है। वहां की जनता समझती है कि इस तरह के फैसले किस तरह से देश की आंतरिक सुरक्षा को कमजोर करते हैं। कांग्रेस पार्टी इस पर चुप क्यों है? क्या केवल सत्ता पाने के लिए देश की सुरक्षा से खिलवाड़ किया जाएगा?”
कांग्रेस और विपक्ष पर दबाव
अमित शाह का यह बयान उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर चल रही राजनीति में नई बहस छेड़ गया है। भाजपा लगातार यह मुद्दा उठा रही है कि विपक्ष ने नक्सल समर्थक छवि वाले नेता को क्यों चुना। विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा इस मुद्दे को चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करेगी, खासकर केरल और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, जहां नक्सलवाद एक बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है।
विपक्ष की रणनीति और भाजपा की चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इंडी गठबंधन ने सुदर्शन रेड्डी को इसलिए चुना क्योंकि उनका कानूनी अनुभव और सुप्रीम कोर्ट की पृष्ठभूमि है। विपक्ष इस चुनाव को लोकतांत्रिक और वैचारिक संघर्ष के रूप में पेश करना चाहता है। लेकिन भाजपा इस फैसले को जनता के सामने “नक्सलवाद समर्थक मानसिकता” के रूप में रख रही है। इससे न केवल विपक्ष की रणनीति सवालों में घिर सकती है, बल्कि केरल और दक्षिण भारत की राजनीति पर भी असर पड़ सकता है।
नक्सलवाद और राजनीति का जुड़ाव
यह पहला मौका नहीं है जब नक्सलवाद का मुद्दा चुनावी राजनीति में उभरा हो। इससे पहले भी भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे पर नक्सलवाद को लेकर हमले करती रही हैं। लेकिन इस बार मामला उपराष्ट्रपति चुनाव से जुड़ा है, जो देश के सर्वोच्च पदों में से एक है। ऐसे में उम्मीदवार के रिकॉर्ड और छवि पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
उपराष्ट्रपति चुनाव अब सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह नक्सलवाद बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा की बहस में बदलता जा रहा है। अमित शाह का बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि भाजपा इस मुद्दे को आने वाले समय में और उछालेगी। क्या सुदर्शन रेड्डी का फैसला केवल “संवैधानिक और न्यायिक” था, या फिर यह “वामपंथी विचारधारा” से प्रेरित था? यह बहस अभी और गरमाने वाली है।