कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की संगठनात्मक संरचना की सराहना किए जाने के बाद पैदा हुए राजनीतिक विवाद के बीच पार्टी सांसद और तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सदस्य शशि थरूर उनके समर्थन में सामने आए हैं। थरूर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए संगठनात्मक मजबूती और आंतरिक अनुशासन बेहद अहम होता है और कांग्रेस को अपने लंबे इतिहास से सीख लेकर खुद को मजबूत करना चाहिए।
शशि थरूर ने कहा कि कांग्रेस 140 वर्षों से अधिक पुरानी पार्टी है और उसके पास सीखने के लिए अपना ही समृद्ध अनुभव मौजूद है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पार्टी को अपने अतीत की सफलताओं और गलतियों, दोनों से सबक लेना चाहिए। थरूर के अनुसार, किसी भी संगठन की मजबूती का आधार अनुशासन होता है और यही सिद्धांत कांग्रेस पर भी लागू होता है।
उन्होंने कहा, “हमारा 140 साल का इतिहास है और उससे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। हम खुद से भी सीख सकते हैं। किसी भी पार्टी में अनुशासन बहुत जरूरी होता है।” थरूर ने यह बयान ऐसे समय में दिया है, जब दिग्विजय सिंह के आरएसएस से जुड़े बयान को लेकर कांग्रेस के भीतर और बाहर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
शशि थरूर ने यह भी साफ किया कि पार्टी संगठन को मजबूत करना केवल किसी एक नेता का नहीं, बल्कि पूरे संगठन का साझा उद्देश्य होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वह स्वयं भी चाहते हैं कि कांग्रेस का संगठन और अधिक मजबूत हो। “मैं भी चाहता हूं कि हमारा संगठन मजबूत हो। संगठन में अनुशासन होना चाहिए। दिग्विजय सिंह अपने बयान को खुद स्पष्ट कर सकते हैं,” थरूर ने कहा।
कांग्रेस में सुधार और अनुशासन पर जोर
थरूर ने दिग्विजय सिंह की उस व्यापक सोच का भी समर्थन किया, जिसमें कांग्रेस के भीतर सुधारों की जरूरत पर बात की गई है। उनके अनुसार, मौजूदा राजनीतिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए कांग्रेस को अपने संगठनात्मक ढांचे और आंतरिक अनुशासन पर विशेष ध्यान देना होगा। थरूर ने संकेत दिया कि पार्टी को समय के साथ खुद को ढालना और मजबूत बनाना जरूरी है।
जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने इस विवाद के बाद दिग्विजय सिंह से बात की है, तो थरूर ने कहा कि उनके बीच बातचीत होना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा, “हम दोस्त हैं और आपस में बातचीत होना स्वाभाविक है। संगठन को मजबूत किया जाना चाहिए, इस पर कोई सवाल ही नहीं है।” उनके इस बयान से यह संकेत मिलता है कि पार्टी के भीतर मतभेदों के बावजूद संवाद और सुधार की जरूरत को लेकर सहमति मौजूद है।
कैसे शुरू हुआ विवाद
यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब दिग्विजय सिंह ने शनिवार को आरएसएस की संगठनात्मक ताकत की सराहना करते हुए एक सोशल मीडिया पोस्ट साझा की। उन्होंने वर्ष 1995 की एक तस्वीर पोस्ट की, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जमीन पर बैठे हुए तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी के पास दिखाई दे रहे हैं। इस तस्वीर के जरिए सिंह ने यह संदेश देने की कोशिश की कि आरएसएस और भाजपा में जमीनी स्तर से जुड़े कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है और वे शीर्ष पदों तक पहुंच सकते हैं।
दिग्विजय सिंह ने अपने पोस्ट में कहा था कि कांग्रेस भी इस मॉडल से सीख सकती है, जहां संगठन के भीतर विकेंद्रीकरण और जमीनी कार्यकर्ताओं को आगे लाने की व्यवस्था होती है। हालांकि, इस टिप्पणी को लेकर राजनीतिक गलियारों में हंगामा मच गया और कांग्रेस के भीतर भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
सफाई के बाद भी नहीं थमा विवाद
बढ़ते विवाद के बीच दिग्विजय सिंह ने बाद में स्पष्ट किया कि वह आरएसएस और भाजपा के कट्टर आलोचक रहे हैं और उनकी वैचारिक असहमति आज भी बरकरार है। उन्होंने कहा कि उनकी टिप्पणी का उद्देश्य आरएसएस की विचारधारा का समर्थन करना नहीं, बल्कि संगठनात्मक ढांचे से जुड़े पहलुओं पर बात करना था। इसके बावजूद, उनके बयान को लेकर पार्टी के अंदर और बाहर आलोचना जारी रही।
इस विवाद ने कांग्रेस में चल रही उस आंतरिक बहस को फिर से तेज कर दिया है, जिसमें संगठनात्मक सुधार, नेतृत्व की भूमिका और सत्ता के विकेंद्रीकरण जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है। पार्टी ऐसे समय में अपने ढांचे और रणनीति की समीक्षा कर रही है, जब उसे लगातार चुनावी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
पार्टी के भविष्य पर नजर
दिग्विजय सिंह के बयान और उस पर शशि थरूर की प्रतिक्रिया ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक मजबूती और अनुशासन को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है। भले ही आरएसएस को लेकर की गई टिप्पणी पर मतभेद हों, लेकिन वरिष्ठ नेताओं का यह मानना है कि पार्टी के भविष्य के लिए आंतरिक सुधार अनिवार्य हैं।
शशि थरूर जैसे नेताओं का कहना है कि कांग्रेस को अपने लंबे इतिहास, अनुभव और संगठनात्मक मूल्यों के सहारे खुद को फिर से सशक्त बनाना होगा। यह विवाद भले ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो, लेकिन इसने कांग्रेस के भीतर आत्ममंथन और सुधार की जरूरत को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।