नई दिल्ली: संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान मंगलवार को लोकसभा में उस समय तीखी बहस छिड़ गई, जब केंद्र सरकार ने एक नए विधेयक को हिंदी शीर्षक के साथ पेश किया। विपक्ष ने इसे संसदीय परंपराओं का उल्लंघन और भाषाई थोपने की कोशिश बताते हुए सरकार को घेरा। विवाद की जड़ ‘सबका बीमा, सबकी रक्षा (बीमा कानून संशोधन) विधेयक, 2025’ का नाम रहा, जिसे लेकर विपक्ष ने संवैधानिक सुरक्षा उपायों का हवाला दिया।
विपक्ष का तर्क: क्या यह राजनीतिक संदेश है?
विपक्ष के सांसदों ने आरोप लगाया कि सरकार विधायी भाषा और राजनीतिक नारेबाजी के बीच की रेखा को धुंधला कर रही है। आरएसपी (RSP) सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने इस मुद्दे पर मोर्चा खोलते हुए कहा कि किसी भी विधेयक का शीर्षक उसके उद्देश्य और सामग्री को स्पष्ट रूप से जनता तक पहुँचाने वाला होना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया, “विधेयक का शीर्षक उसके सार से जुड़ा होना चाहिए। इस मामले में, हिंदी शीर्षक का उस कानून के वास्तविक प्रावधानों से कोई सीधा संबंध नहीं है जिसे सरकार लागू करना चाहती है।”
संविधान और आधिकारिक भाषा अधिनियम का हवाला
बहस के दौरान एन.के. प्रेमचंद्रन ने संविधान के अनुच्छेद 348 का उल्लेख किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संसद में पेश किए जाने वाले विधेयकों का आधिकारिक और प्रामाणिक पाठ (Authoritative Text) अंग्रेजी में होना अनिवार्य है, जब तक कि संसद कानून द्वारा अन्यथा व्यवस्था न करे। उन्होंने राजभाषा अधिनियम, 1963 का भी जिक्र करते हुए कहा कि हालांकि सांसदों की सुविधा के लिए हिंदी अनुवाद वितरित किए जा सकते हैं, लेकिन आधिकारिक अंग्रेजी पाठ में हिंदी अभिव्यक्तियों को मिलाना संवैधानिक रूप से उचित नहीं है।
तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत राय ने भी इस मुद्दे पर सरकार की आलोचना की और इसे ‘कानूनों का हिंदीकरण’ करार दिया।
क्या है इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य?
विवादास्पद नाम वाला यह बीमा विधेयक भारत के बीमा क्षेत्र में बड़े बदलाव लाने के लिए पेश किया गया है। इसके प्रमुख प्रावधानों में शामिल हैं:
विदेशी कंपनियों को भारतीय बीमा फर्मों में 100% हिस्सेदारी रखने की अनुमति देना।
बीमा क्षेत्र के विनियामक ढांचे (Regulatory Regime) में सुधार करना और उसे वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाना।
सरकार और स्पीकर का स्पष्टीकरण
विपक्ष के हंगामे के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्पष्ट किया कि विधेयक की आधिकारिक भाषा अभी भी अंग्रेजी ही है, हालांकि इसके साथ हिंदी का उपयोग किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी विधेयक का नामकरण और उसकी भाषा तय करना संबंधित मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है।
बाद में, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “यह पूरी तरह स्थापित है कि भारत संघ के आधिकारिक उद्देश्यों के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों का उपयोग किया जा सकता है और दोनों ही मान्य हैं।” रिजिजू ने तर्क दिया कि इस मामले में अनुच्छेद 348 को घसीटना अनावश्यक है और विधेयकों को पेश करने पर आपत्तियां लोकसभा की प्रक्रिया के नियम 72 के तहत आती हैं।