भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अपने अंतिम चरण में बताया जा रहा है। हालांकि, इस समझौते से कृषि क्षेत्र को बाहर रखने की संभावना जताई जा रही है। कृषि लंबे समय से भारत के लिए किसी भी FTA में एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। यही वजह है कि अमेरिका के साथ लंबित FTA वार्ताओं में भी कृषि प्रमुख अड़चन बनी हुई है। विशेषज्ञों और उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत के लिए कृषि को FTA से अलग रखना आजीविका और सब्सिडी ढांचे से जुड़ा हुआ मामला है।
कृषि और आजीविका का सवाल
भारत में कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन है। वर्ष 2015-16 की कृषि जनगणना के अनुसार, भारत में 14.64 करोड़ परिचालन जोतें थीं। इसके अलावा, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-Kisan) योजना के तहत अप्रैल-जुलाई 2025 की किस्त में 9.71 करोड़ किसान परिवारों को लाभ मिला।
इसके मुकाबले अमेरिका में 2024 के सर्वे के अनुसार केवल 18.8 लाख फार्म, जबकि EU में 2020 में 90.7 लाख फार्म थे। इतनी बड़ी आबादी के कृषि पर निर्भर होने के कारण भारत सरकार विदेशी कृषि उत्पादों को शुल्क में कटौती और गैर-शुल्क बाधाएं हटाकर बाजार में प्रवेश देने को लेकर सतर्क रही है।
EU का अनुभव और किसानों का विरोध
कृषि संवेदनशीलता केवल भारत तक सीमित नहीं है। यूरोपीय संघ ने भी जनवरी 2025 में अर्जेंटीना, ब्राजील, पराग्वे और उरुग्वे जैसे मर्कोसुर देशों के साथ एक अंतरिम व्यापार समझौता किया था। लेकिन 21 जनवरी 2025 को यूरोपीय संसद ने 334 के मुकाबले 324 वोटों से इस समझौते को यूरोपीय न्यायालय को भेजने का फैसला किया।
इससे पहले फ्रांस समेत कई EU देशों में किसानों ने विरोध प्रदर्शन किए थे। उनका कहना था कि इस समझौते से बीफ, चीनी और पोल्ट्री उत्पादों का आयात बढ़ेगा, जिससे स्थानीय किसानों को नुकसान होगा।
कृषि सब्सिडी दूसरा बड़ा कारण
FTA में कृषि को शामिल न करने का दूसरा बड़ा कारण कृषि सब्सिडी है। OECD के अनुसार, EU में 2022-24 के दौरान किसानों को औसतन 97.3 अरब डॉलर की वार्षिक सहायता मिली, जो कुल कृषि आय का 16.4% है। इसमें प्रत्यक्ष भुगतान, इनपुट सब्सिडी और बाजार मूल्य समर्थन शामिल है।
अमेरिका में इसी अवधि में किसानों को 38.2 अरब डॉलर का समर्थन मिला, जो कुल आय का 7.1% रहा।
भारत की स्थिति
भारत की स्थिति इन दोनों से अलग है। 2022-24 के दौरान भारत ने उर्वरक, बिजली, सिंचाई, ऋण और मशीनरी जैसी इनपुट सब्सिडी पर औसतन 47.9 अरब डॉलर खर्च किए। हालांकि, PM-Kisan जैसी योजनाओं के तहत प्रत्यक्ष आय सहायता केवल 7.9 अरब डॉलर रही।
OECD के अनुमान के अनुसार, भारत में कृषि उत्पादों पर मूल्य नियंत्रण और निर्यात प्रतिबंधों के कारण किसानों को मिलने वाला बाजार मूल्य अंतरराष्ट्रीय कीमतों से कम रहा। इसके चलते भारत का कृषि मूल्य समर्थन माइनस 129 अरब डॉलर आंका गया, यानी किसानों पर शुद्ध कर का प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप, भारत का कृषि PSE माइनस 73.1 अरब डॉलर रहा।
EU समझौता बनाम US समझौता
भारतीय कृषि विशेषज्ञ और ICRIER के प्रोफेसर अशोक गुलाटी के अनुसार, EU से कृषि आयात का खतरा अमेरिका की तुलना में कम है। उनका कहना है कि अमेरिका से मक्का, सोयाबीन, एथेनॉल और कपास जैसे उत्पादों का बड़ा आयात संभव है, जबकि EU मुख्य रूप से प्रीमियम चीज़, वाइन, स्पिरिट्स और ऑलिव ऑयल तक सीमित रह सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो भारत 15% तक स्टरलाइजेशन ड्यूटी लगाकर EU की सब्सिडी का असर संतुलित कर सकता है।
भारत के निर्यात हित
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने EU को झींगा-प्रॉन, कॉफी, चाय, अंगूर, चावल, मसाले और समुद्री उत्पादों का बड़ा निर्यात किया। यह दर्शाता है कि EU के साथ कृषि व्यापार भारत के लिए अवसर भी पैदा कर सकता है, बशर्ते संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा बनी रहे।