सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: राज्यों और कुत्ता खिलाने वालों को डॉग अटैक के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है

Vin News Network
Vin News Network
7 Min Read
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और कुत्ता फीडरों को डॉग अटैक और उससे होने वाली मौतों के लिए जिम्मेदार ठहराने का संकेत दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को साफ संकेत दिया कि वह राज्यों और कुत्ता पालक या फीडरों पर हर डॉग बाइट और उससे होने वाली मौत के लिए “भारी” जिम्मेदारी लगा सकती है। कोर्ट ने कहा कि डॉग अटैक का प्रभाव जीवनभर रह सकता है और ऐसे मामलों में प्रभावित व्यक्ति को उचित मुआवजा देना राज्यों और कुत्ता खिलाने वालों की जिम्मेदारी होगी।

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा, “हर डॉग बाइट और हर मौत के लिए हम संभवतः भारी मुआवजा तय करेंगे। साथ ही कुत्ता फीडरों को भी जिम्मेदार ठहराया जाएगा। आप उन्हें अपने घर में रखते हैं, खिलाते हैं, तो उन्हें सड़कों पर घूमने और काटने-भौंकने की अनुमति क्यों दी जाए?”

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देशभर में स्ट्रीट डॉग्स और सड़कों पर जानवरों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंता को ध्यान में रखा जा रहा है।

नौ साल के बच्चे की मौत पर सवाल

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पूछा कि यदि कोई विशेष संगठन कुत्तों को फीड करता है और उसके कारण नौ साल का बच्चा मौत के घाट गिरता है, तो उस संगठन को मुआवजे के लिए जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल डॉग के काटने तक मामला सीमित नहीं है, बल्कि उनके डराने और उत्पन्न खतरे को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

कुत्तों की मानसिकता को समझ पाना मुश्किल

7 जनवरी की पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह जान पाना असंभव है कि कोई कुत्ता किस मूड में है। स्ट्रीट डॉग्स पर न्यायालय के आदेश का विरोध करने वाले पक्षकारों ने तर्क दिया कि जानवरों के प्रति सहानुभूति रखने से हम डॉग अटैक को रोक सकते हैं।

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा, “अगर जानवरों के साथ सहानुभूति दिखाई जाए तो वे हमला नहीं करेंगे। लेकिन अगर आप उनके क्षेत्र में घुसते हैं, तो वे आक्रामक हो जाते हैं।”

इस पर न्यायाधीश विक्रम नाथ ने कहा कि मामला केवल काटने तक सीमित नहीं है, बल्कि जानवरों के कारण उत्पन्न खतरे और मानसिक प्रभाव को भी ध्यान में रखना होगा। उन्होंने पूछा, “आप कैसे पहचान सकते हैं कि कौन सा कुत्ता सुबह किस मूड में है?”

सिब्बल ने समाधान के रूप में सुझाव दिया कि यदि कोई कुत्ता अनुशासित नहीं है, तो उसे संबंधित सेंटर बुलाकर नसबंदी कराकर सुरक्षित तरीके से वापस छोड़ा जाए।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और सुरक्षा निर्देश

सुप्रीम कोर्ट इस समय स्ट्रीट डॉग्स और पशुओं से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहा है। तीन न्यायाधीशों की बेंच – न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारिया – ने सड़कों और हाइवे पर जानवरों से जुड़े सुरक्षा जोखिम पर गंभीर चिंता जताई है।

7 नवंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, खेल परिसर, बस अड्डे और रेलवे स्टेशनों से स्ट्रीट डॉग्स को हटाकर उनके लिए निर्धारित शेल्टर में स्थानांतरित किया जाए। इसके लिए पहले कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण अनिवार्य किया गया।

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह केवल जानवरों की भलाई का मामला नहीं है, बल्कि लोगों की सुरक्षा और बच्चों की रक्षा का भी मामला है।

डॉग फीडरों और संगठनों की जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि जो लोग कुत्तों को पालते या फीड करते हैं, उन्हें भी जिम्मेदारी उठानी होगी। अदालत ने तर्क दिया कि कोई भी व्यक्ति या संगठन यदि कुत्तों को अपने घर या संस्थान में रखता है और उन्हें नियमित रूप से खिला-पिला रहा है, तो उसके पास यह दायित्व है कि वह सुनिश्चित करे कि वे सार्वजनिक जगहों पर हानिकारक न हों।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि राज्य सरकार या संगठन आवश्यक सावधानी और कदम नहीं उठाते हैं, तो उन्हें हर डॉग बाइट और मौत के लिए मुआवजा देना पड़ेगा।

  • कानून, मानव सुरक्षा और पशु कल्याण का संतुलन
  • सुप्रीम कोर्ट का मामला इस संतुलन को उजागर करता है:
  • मानव सुरक्षा: बच्चों और आम जनता की जान और सुरक्षा सर्वोच्च है।
  • जानवरों की भलाई: कुत्तों के लिए नसबंदी, टीकाकरण और सुरक्षित शेल्टर अनिवार्य है।
  • राज्य और संगठनों की जवाबदेही: दोनों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके कारण जानवर खतरा न बनें।
  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह जिम्मेदारी केवल सरकारी एजेंसियों तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिक संगठनों और कुत्ता पालकों तक भी फैली हुई है।

भविष्य की दिशा

सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई देशभर के लिए मिसाल बन सकती है। अगर अदालत कड़े मुआवजे और जिम्मेदारी के आदेश देती है, तो:

  • राज्य सरकारें और नगरपालिका अधिक सक्रिय कदम उठाएंगी।
  • कुत्ता फीडर और संगठन अपने पालित जानवरों की निगरानी करेंगे।
  • शहरी क्षेत्रों में स्ट्रीट डॉग्स की संख्या और नियंत्रण पर ध्यान बढ़ेगा।
  • बच्चों और आम जनता की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि स्ट्रीट डॉग्स और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि राज्यों और फीडरों ने आवश्यक कदम नहीं उठाए, तो हर डॉग बाइट और मौत के लिए भारी मुआवजा तय किया जा सकता है।

इस मामले में अदालत का दृष्टिकोण यह है कि कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण, सुरक्षित शेल्टर और निगरानी सुनिश्चित करना केवल पशु कल्याण नहीं, बल्कि मानव सुरक्षा का भी मामला है।

सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई से स्पष्ट संदेश गया है: सड़क पर जानवरों की सुरक्षा के साथ-साथ लोगों की सुरक्षा प्राथमिकता है, और इसके लिए सभी जिम्मेदार पक्षों को कानून के तहत जवाबदेह ठहराया जाएगा।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *