मध्य प्रदेश के इंदौर में कम से कम 9 लोगों की मौत से जुड़े मामले की जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। शुरुआती जांच रिपोर्ट में यह पुष्टि हुई है कि पीने के पानी में ऐसे बैक्टीरिया पाए गए हैं, जो आमतौर पर सीवर के पानी में मौजूद होते हैं। प्रयोगशाला परीक्षणों से साफ हो गया है कि इलाके में फैला उल्टी-दस्त का प्रकोप सीधे तौर पर दूषित पेयजल के कारण हुआ।
रिपोर्ट्स के अनुसार, पानी के नमूनों में वाइब्रियो कॉलरा, शिगेला और ई.कोलाई जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए हैं। ये सभी जीवाणु गंभीर आंतों के संक्रमण के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं और इनसे तीव्र दस्त, उल्टी और निर्जलीकरण जैसी समस्याएं होती हैं।
यह प्रकोप इंदौर के भागीरथपुरा इलाके से सामने आया, जिसने शहर की जल सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि इंदौर लगातार आठ वर्षों से देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित होता रहा है, इसके बावजूद इस तरह की घटना ने प्रशासनिक लापरवाही को उजागर किया है।
इंदौर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. माधव प्रसाद हसानी ने बताया कि शहर के एक मेडिकल कॉलेज में की गई लैब जांच से यह स्पष्ट हुआ कि बीमारी का स्रोत दूषित पेयजल ही था। जांच में सामने आया कि इलाके की भूमिगत जल आपूर्ति पाइपलाइन में रिसाव के कारण सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल गया।
अधिकारियों के अनुसार, भागीरथपुरा में एक पुलिस चौकी के पास मुख्य जल आपूर्ति लाइन में बड़ा लीकेज पाया गया। बताया गया कि इसी स्थान पर पाइपलाइन के ऊपर एक शौचालय का निर्माण किया गया था, जिससे पाइप को नुकसान पहुंचा और सीवर का गंदा पानी सप्लाई लाइन में प्रवेश कर गया। इसी वजह से पूरे क्षेत्र में पानी दूषित हुआ।
इस मामले की जांच कर रहे अतिरिक्त मुख्य सचिव संजय दुबे ने कहा कि भागीरथपुरा की पूरी पेयजल पाइपलाइन नेटवर्क की जांच की जा रही है, ताकि किसी अन्य संभावित रिसाव का पता लगाया जा सके। उन्होंने बताया कि निरीक्षण के बाद गुरुवार को घरों में साफ पानी की आपूर्ति बहाल कर दी गई है, हालांकि एहतियात के तौर पर लोगों को पानी उबालकर पीने की सलाह दी गई है।
संजय दुबे ने यह भी कहा कि ताजा पानी के नमूने दोबारा जांच के लिए भेजे गए हैं। भागीरथपुरा की घटना से सीख लेते हुए राज्यभर में भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की जाएगी।
प्रशासन के मुताबिक, स्थानीय लोगों ने सबसे पहले 25 दिसंबर के आसपास पानी से दुर्गंध आने की शिकायत की थी। वहीं, कई निवासियों का कहना है कि यह समस्या इससे पहले कई हफ्तों से बनी हुई थी, लेकिन समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं की गई। शुरुआत में क्षेत्र से 14 मौतों की सूचना मिली थी, लेकिन बाद में अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इनमें से 9 मौतें सीधे तौर पर दूषित पानी से हुए डायरिया के कारण हुईं, जबकि बाकी मौतें अन्य बीमारियों या सह-रोगों से जुड़ी थीं।
प्रकोप का असर बड़े पैमाने पर देखा गया है। अब तक 2,400 से अधिक लोग उल्टी और दस्त के लक्षणों की शिकायत कर चुके हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने गुरुवार को 1,714 घरों का सर्वे किया और 8,571 लोगों की जांच की, जिनमें से 338 लोगों में हल्के लक्षण पाए गए और उन्हें घर पर ही इलाज दिया गया।
पिछले आठ दिनों में कुल 272 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। इनमें से 71 मरीजों को छुट्टी दे दी गई है, जबकि 201 मरीज अभी भी अस्पताल में इलाजरत हैं। इनमें 32 मरीजों की हालत गंभीर बताई जा रही है और उन्हें आईसीयू में रखा गया है।
इस गंभीर मामले पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। आयोग ने कहा है कि दूषित पानी की शिकायतें कई दिनों तक सामने आने के बावजूद कार्रवाई न होना मानवाधिकार उल्लंघन की आशंका को दर्शाता है। एनएचआरसी ने राज्य के मुख्य सचिव से दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह अलर्ट पर है। शहर की जल आपूर्ति व्यवस्था की कड़ी निगरानी की जा रही है और पुराने पाइपलाइनों की स्थिति की भी जांच हो रही है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस घटना को “आपातकाल जैसी स्थिति” बताया और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया। उन्होंने इंदौर के अस्पतालों का दौरा कर मरीजों का हाल जाना और बाद में उच्चस्तरीय बैठक कर हालात की समीक्षा की।