भारतीय बॉन्ड बाजार में बुधवार को बीते चार महीनों की सबसे तेज तेजी देखने को मिली, जब भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंकिंग सिस्टम में नकदी बढ़ाने के लिए बड़े और आक्रामक कदमों का ऐलान किया। केंद्रीय बैंक की ओर से सरकारी बॉन्ड खरीद और विदेशी मुद्रा स्वैप जैसी घोषणाओं के बाद निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ और सरकारी बॉन्ड की कीमतों में जोरदार उछाल आया। इस कदम को बाजार ने आरबीआई की “शॉक-एंड-ऑ” रणनीति के तौर पर देखा, जिसका मकसद तरलता संकट को दूर करना और ब्याज दरों को काबू में रखना है।
मंगलवार शाम आरबीआई ने बताया कि वह दिसंबर और जनवरी के दौरान चार चरणों में कुल 2 ट्रिलियन रुपये (करीब 22 अरब डॉलर) के सरकारी बॉन्ड खरीदेगा। इसके अलावा, अगले महीने 10 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा स्वैप भी किया जाएगा। यह कदम इस महीने की शुरुआत में घोषित तरलता उपायों की तुलना में दोगुना है। इसके तुरंत बाद बुधवार को बॉन्ड बाजार में जबरदस्त प्रतिक्रिया देखने को मिली और बेंचमार्क 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड में 8 बेसिस प्वाइंट तक की गिरावट दर्ज की गई, जो 14 अगस्त के बाद की सबसे बड़ी एकदिनी गिरावट है। यील्ड घटकर 6.56 प्रतिशत के स्तर तक आ गई।
विशेषज्ञों के अनुसार, आरबीआई का यह कदम हाल के दिनों में बढ़ते दबाव को देखते हुए उठाया गया है। इस सप्ताह की शुरुआत में 10 वर्षीय बॉन्ड यील्ड नौ महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी, जिससे सरकार और निजी क्षेत्र दोनों के लिए उधारी महंगी होने की आशंका बढ़ गई थी। आरबीआई की ताजा घोषणा से यह साफ हो गया है कि केंद्रीय बैंक उधारी लागत को स्थिर रखने और आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
आरबीआई द्वारा घोषित यह तरलता प्रवाह उस नकदी कमी की भरपाई करने के लिए भी अहम माना जा रहा है, जो रुपये को संभालने के लिए डॉलर बिक्री के कारण पैदा हुई थी। इस साल एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल रुपये को सहारा देने के लिए आरबीआई ने विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया, जिससे बैंकिंग सिस्टम से नकदी बाहर चली गई। नए उपायों से इस नकदी निकासी का असर काफी हद तक संतुलित होने की उम्मीद है।
हालिया आंकड़ों के मुताबिक, बैंकिंग सिस्टम की तरलता 22 दिसंबर तक 727 अरब रुपये के घाटे में चली गई थी, जबकि इसी महीने की शुरुआत में यह 2.6 ट्रिलियन रुपये के अधिशेष में थी। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स द्वारा संकलित आंकड़े बताते हैं कि टैक्स भुगतान के कारण नकदी निकासी और रुपये को समर्थन देने के लिए आरबीआई की डॉलर बिक्री ने सिस्टम पर दबाव बढ़ा दिया था। इसके चलते बैंकों की ओवरनाइट उधारी लागत में भी इस सप्ताह तेज बढ़ोतरी देखी गई।
बॉन्ड बाजार पहले से ही दबाव में था, क्योंकि राज्यों की ओर से कर्ज आपूर्ति में संभावित तेज बढ़ोतरी को लेकर चिंताएं बनी हुई थीं। निवेशकों को आशंका थी कि अगर राज्यों की उधारी अचानक बढ़ती है, तो सरकारी बॉन्ड की आपूर्ति ज्यादा होने से कीमतों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। हालांकि, आरबीआई के ताजा कदमों ने इन आशंकाओं को काफी हद तक कम कर दिया है और बाजार में स्थिरता लौटने के संकेत मिले हैं।
बुधवार की तेजी को एक और सकारात्मक संकेत से भी समर्थन मिला। मंगलवार को कारोबार बंद होने के बाद जारी आंकड़ों से पता चला कि आरबीआई सहित कुछ प्रमुख बाजार प्रतिभागियों ने 47.4 अरब रुपये के सरकारी बॉन्ड खरीदे। यह 11 नवंबर के बाद का सबसे बड़ा एकदिनी निवेश है। इस खरीदारी ने संकेत दिया कि केंद्रीय बैंक और अन्य संस्थागत निवेशक मौजूदा यील्ड स्तरों को आकर्षक मान रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि आरबीआई के ये कदम सिर्फ अल्पकालिक राहत के लिए नहीं हैं, बल्कि इनका उद्देश्य व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है। वैश्विक स्तर पर अमेरिका की ओर से सख्त व्यापार शुल्क और ऊंची ब्याज दरों का दबाव बना हुआ है। ऐसे माहौल में आरबीआई यह सुनिश्चित करना चाहता है कि घरेलू वित्तीय स्थितियां बहुत ज्यादा सख्त न हों और विकास की रफ्तार पर असर न पड़े।
कुल मिलाकर, आरबीआई की आक्रामक तरलता रणनीति ने भारतीय बॉन्ड बाजार को मजबूत सहारा दिया है। निवेशकों को उम्मीद है कि आने वाले हफ्तों में नकदी स्थिति सुधरेगी, यील्ड पर दबाव कम होगा और बाजार में उतार-चढ़ाव घटेगा। यह कदम सरकार की उधारी लागत को काबू में रखने और अर्थव्यवस्था को स्थिर गति से आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है।