SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से मांगा जवाब

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SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब।

देशभर में जारी वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। यह याचिका राजद सांसद मनोज झा की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें SIR प्रक्रिया में वोटरों से जन्म प्रमाणपत्र या ऐसे दस्तावेज़ मांगे जाने पर सवाल उठाए गए हैं, जो यह साबित करते हों कि उनके माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक थे। याचिका में कहा गया है कि यह प्रक्रिया कई लोगों के लिए व्यवहारिक रूप से कठिन हो सकती है, क्योंकि बड़ी संख्या में नागरिकों के पास पुराने पारिवारिक दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं होते। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों, गरीब परिवारों और उन लोगों के लिए यह चुनौती अधिक हो सकती है, जिनके माता-पिता का निधन बहुत पहले हो चुका है या जिनके पास आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ कर रही है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलीलें प्रस्तुत कीं। उन्होंने कहा कि SIR प्रक्रिया के तहत जिन दस्तावेज़ों की मांग की जा रही है, उन्हें उपलब्ध कराना देश के कई हिस्सों में संभव नहीं होगा। सिब्बल ने तर्क दिया कि कई राज्यों में जन्म प्रमाणपत्र पहले आमतौर पर नहीं बनाए जाते थे, ऐसे में नागरिकता साबित करने के लिए निर्धारित दस्तावेज़ उपलब्ध कराना सभी के लिए एकसमान रूप से आसान नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रक्रिया के क्रियान्वयन के लिए राज्यों को कम समय दिया गया है, जिससे बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि SIR की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को अपने दस्तावेज़ों की जांच कराने के लिए सरकारी कार्यालयों में जाना होगा, और सत्यापन की जिम्मेदारी BLOs पर होगी। कई स्थानों पर BLOs ने भी काम की अधिकता और समय की कमी को लेकर चिंता जताई है। इसके अलावा, नागरिकों को यह आशंका है कि यदि वे निर्धारित दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं करा पाते हैं, तो उनका नाम मतदाता सूची से हट सकता है। इस वजह से कई क्षेत्रों में इस प्रक्रिया को लेकर असमंजस और सवाल उठ रहे हैं।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार और चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया का अपना उद्देश्य स्पष्ट किया है। उनके अनुसार, इस रिवीजन का लक्ष्य वोटर लिस्ट को अधिक सटीक और अद्यतित रखना है। कई राज्यों में डुप्लीकेट वोटर, मृत व्यक्तियों के नाम या पुराने रिकॉर्ड पाए जाते हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि सूची को शुद्ध करना आवश्यक है ताकि मतदान प्रक्रिया पारदर्शी और विश्वसनीय बनी रहे। आयोग ने यह भी कहा कि नागरिकता सत्यापन का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि सूची में शामिल हर नाम योग्य और कानूनन पात्र हो।

कुछ राज्यों में SIR को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी चर्चा बढ़ी है, जहां विपक्षी दलों ने प्रक्रिया की समयसीमा और दस्तावेज़ी आवश्यकताओं को लेकर सवाल उठाए हैं। हालांकि, कई राज्यों में प्रशासन ने यह कहा है कि SIR प्रक्रिया नियमित चुनावी सुधारों का हिस्सा है और इसे समय-समय पर अपडेट किया जाता है। विभिन्न राज्यों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली हैं—कुछ जगहों पर इसे सकारात्मक माना जा रहा है, तो कुछ क्षेत्रों में नागरिक इससे चिंतित भी दिखाई दे रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और केंद्र सरकार व चुनाव आयोग से विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत ने कहा कि वह इस प्रक्रिया की व्यवहारिकता, संवैधानिक आधार और उस पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करेगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह दस्तावेज़ी आवश्यकताओं की वास्तविक कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए निर्णय देगी। अगली सुनवाई में यह तय किया जा सकता है कि क्या SIR प्रक्रिया में कुछ संशोधन होंगे या इसे पहले की तरह ही जारी रखा जाएगा।

वर्तमान स्थिति यह है कि देश के कई हिस्सों में SIR की गतिविधियाँ जारी हैं। BLO घर-घर जाकर जानकारी एकत्र कर रहे हैं और कई राज्य प्रशासन अपने स्तर पर दस्तावेज़ी सहायता केंद्र भी स्थापित कर रहे हैं। लोगों को प्रक्रिया के बारे में समझाने और सहायता प्रदान करने के लिए कुछ जिलों में हेल्पडेस्क भी बनाए गए हैं। इससे प्रशासन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अधिक से अधिक पात्र नागरिक अपने नाम मतदाता सूची में सही रूप से दर्ज करा सकें।

वोटर लिस्ट रिवीजन को लेकर यह मुद्दा तकनीकी, कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं से जुड़ा है। एक ओर, चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची को अपडेट और सटीक रखने की नियमित प्रक्रिया के रूप में देखता है, वहीं दूसरी ओर, याचिका में कहा गया है कि इसकी कुछ आवश्यकताएँ नागरिकों के लिए कठिन हो सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट के आने वाले फैसले से यह स्पष्ट हो जाएगा कि आगे यह प्रक्रिया किस रूप में लागू होगी और क्या इससे संबंधित नियमों में कोई संशोधन या राहत दी जाएगी। फिलहाल सभी पक्षों की निगाहें अदालत के अगले निर्देशों पर टिकी हैं, जो इस मुद्दे पर अंतिम दिशा तय कर सकते हैं।

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