तेज़ी से बदलती अर्थव्यवस्था—आंकड़ों में भी अपडेट ज़रूरी: पूनम गुप्ता

Vin News Network
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बदलती अर्थव्यवस्था, नया डेटा ढाँचा—RBI ने सांख्यिकीय सुधारों पर दिया ज़ोर।

तेज़ी से बदलती अर्थव्यवस्था को देखते हुए रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा है कि भारत को अपने आर्थिक आंकड़ों की प्रणाली को समयानुकूल बनाना होगा। उनके अनुसार, GDP, CPI और IIP के नए बेस-वर्ष की तैयारी केवल नियमित प्रक्रिया नहीं, बल्कि नीति निर्माण की मजबूती के लिए अनिवार्य कदम है।

पुराने पैमानों से नई अर्थव्यवस्था को मापना मुश्किल
भारत की आर्थिक संरचना पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से बदली है। डिजिटल लेन-देन बढ़ा है, सेवाओं का विस्तार हुआ है और उद्योगों के कामकाज का स्वरूप भी बदला है। ऐसे में पुराने आधार-वर्ष पर बने डेटा अब मौजूदा आर्थिक हालात का सटीक प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते।

गुप्ता का कहना है कि यदि आधार-वर्ष अपडेट नहीं किए गए तो नीतियाँ वास्तविकता से दूर रह सकती हैं और अर्थव्यवस्था की दिशा को समझना कठिन हो जाएगा। RBI की रिपोर्टिंग प्रणाली में भी बड़े बदलावडिप्टी गवर्नर ने बताया कि RBI स्वयं भी अपने डेटा-प्रबंधन को अधिक आधुनिक और पारदर्शी बना रहा है।

बैलेंस ऑफ पेमेंट्स के आँकड़े अब पहले की तुलना में जल्दी जारी किए जा रहे हैं।

इन्हें भविष्य में मासिक आधार पर उपलब्ध कराने की योजना है।

पूर्वानुमान तैयार करने के लिए RBI अब कई नए मॉडल और विविध डेटा-स्रोतों का उपयोग कर रहा है।

उनका कहना है कि इन कदमों से न केवल अनुमान अधिक सटीक होंगे, बल्कि नीतिगत फैसले भी बेहतर आधार पर लिए जा सकेंगे।

GDP, CPI और IIP — नीति निर्धारण के मूल स्तंभ
ये तीनों प्रमुख सूचकांक देश की आर्थिक सेहत की मुख्य झलक देते हैं—
GDP अर्थव्यवस्था की कुल गतिविधि दिखाता है,
CPI परिवारों की उपभोग लागत में बदलाव बताता है,
और IIP उद्योगों की उत्पादन क्षमता का संकेत देता है।

जब अर्थव्यवस्था बदलती है और डेटा स्थिर रहता है, तो ये सूचकांक वास्तविक अर्थव्यवस्था को सही तरीके से पकड़ नहीं पाते। इसलिए आधार-वर्ष में बदलाव, नए डेटा-स्रोतों को शामिल करना और वस्तुओं/सेवाओं की टोकरी को अपडेट करना ज़रूरी है।

सुधार की राह आसान नहीं, लेकिन अनिवार्य
देशभर में उपभोग पैटर्न की विविधता, अनौपचारिक क्षेत्र का बड़ा हिस्सा और लगातार बदलते बाज़ार-रुझान सांख्यिकीय सुधार को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं। फिर भी, विशेषज्ञों का कहना है कि ये बदलाव भारत की आर्थिक नीति को मजबूत, आधुनिक और अधिक विश्वसनीय बनाएंगे।

आगे की दिशा
गुप्ता के अनुसार, आने वाले वर्षों में जब नए बेस-वर्ष लागू होंगे, तब अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर अधिक स्पष्ट दिखाई देगी। इससे नीतियों की सटीकता बढ़ेगी और देश की विकास रणनीति को नई मजबूती मिलेगी। उन्होंने कहा कि सांख्यिकीय ढाँचे को अपडेट करना किसी विकल्प की तरह नहीं, बल्कि तेज़ी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था की जरूरत है।

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