नई दिल्ली। भारत में अक्सर रेलवे स्टेशन, ट्रैफिक सिग्नल या मंदिरों के बाहर हमें लोग हाथ फैलाए भीख मांगते दिख जाते हैं। इनमें कोई बुजुर्ग होता है, कोई दिव्यांग, तो कोई महिला अपनी गोद में बच्चा लिए मदद की गुहार करती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इनकी असली गिनती कैसे होती है और किस राज्य में सबसे ज्यादा भिखारी रहते हैं? दरअसल, भिखारियों की गिनती किसी अलग सर्वे से नहीं बल्कि देश की जनगणना में शामिल की जाती है। इन्हें beggars and vagrants की श्रेणी में रखा जाता है।
भिखारियों की गिनती कैसे होती है?
भारत में भिखारियों की गिनती के लिए कोई स्वतंत्र सर्वे नहीं कराया जाता। जनगणना के दौरान ही ऐसे लोगों की संख्या दर्ज की जाती है। जनगणना में उन लोगों को भिखारी की श्रेणी में डाला जाता है, जो किसी भी तरह का उत्पादक काम नहीं करते और जीविका के लिए भीख पर निर्भर रहते हैं। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर सरकार संसद में जवाब देती है और योजनाएं बनाती है।
2011 की जनगणना के आंकड़े
2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में कुल 4,13,670 भिखारी दर्ज किए गए थे। इनमें से 2,21,673 पुरुष और 1,91,997 महिलाएं थीं। हालांकि यह आंकड़े पुराने हैं और अब तक नई जनगणना नहीं हुई है, इसलिए यही आधिकारिक डेटा आज भी सरकारी दस्तावेजों और चर्चाओं में इस्तेमाल किया जाता है।
किस राज्य में सबसे ज्यादा भिखारी?
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा भिखारी पश्चिम बंगाल में हैं। यहां कुल 81,244 भिखारी दर्ज किए गए थे। इसके बाद उत्तर प्रदेश का स्थान आता है, जहां 65,835 भिखारी पाए गए।
- पश्चिम बंगाल – 81,244
- उत्तर प्रदेश – 65,835
- आंध्र प्रदेश – 30,218
- बिहार – 29,723
- मध्य प्रदेश – 28,695
- राजस्थान – 25,853
वहीं पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों में भिखारियों की संख्या बेहद कम पाई गई थी। नागालैंड, मिजोरम और सिक्किम जैसे राज्यों में इनकी संख्या हजार से भी कम है।
सरकार की योजनाएं और कदम
भीख मांगने वालों के पुनर्वास और उन्हें मुख्यधारा में जोड़ने के लिए सरकार ने स्माइल (SMILE) योजना शुरू की है। इस योजना के तहत भिखारियों और बेघर लोगों को सिर्फ आश्रय ही नहीं बल्कि शिक्षा, चिकित्सा, कौशल विकास और रोजगार से जोड़ने का प्रयास किया जाता है।
दिल्ली, लखनऊ, पटना, नागपुर, इंदौर, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में इस योजना के तहत पायलट प्रोजेक्ट चलाए गए हैं, ताकि भीख मांगने वालों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके।
अदालत की राय क्या है?
दिल्ली हाई कोर्ट ने 2018 में एक अहम फैसले में कहा था कि भीख मांगना अपराध नहीं है बल्कि मजबूरी है। अदालत ने माना कि लोग इसलिए भीख नहीं मांगते क्योंकि उन्हें यह अच्छा लगता है, बल्कि इसलिए क्योंकि उनके पास कोई दूसरा साधन नहीं होता। कोर्ट ने साफ किया कि भीख मांगना एक सामाजिक-आर्थिक समस्या है और इसे अपराध मानने के बजाय पुनर्वास पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
देश में भिखारियों की संख्या लाखों में है और यह सामाजिक-आर्थिक असमानता का सीधा संकेत देती है। सरकार जहां स्माइल योजना जैसे कार्यक्रम चला रही है, वहीं अदालतें भी इसे अपराध के बजाय मजबूरी मानने पर जोर देती हैं। अब 2025 की जनगणना से यह साफ होगा कि बीते एक दशक में भारत में भिखारियों की संख्या घटी है या और बढ़ी है।