टोक्यो : कहा जाता है कि नाम में क्या रखा है, लेकिन जापान की सरकार का कहना है कि नाम केवल पहचान नहीं, भाषा, परंपरा और सामाजिक समझ का हिस्सा है। ऐसे में ‘पिकाचू’ हो या ‘पु’ अब नाम उतने ही ‘चमकेंगे’, जितनी परंपरा इजाजत देगी यानी जापान में अब बच्चों का नामकरण ‘कीरा कीरा’ कल्चर की उड़ान नहीं भरेगा बल्कि परंपरा की पटरी पर चलेगा। हाल में लागू एक नए नियम के तहत माता-पिता अब अपने बच्चों को ‘नाइकी’, ‘पिकाचू’, ‘किट्टी’ या ‘पु’ जैसे नाम नहीं दे सकेंगे।
वजह ? नामों से उपजा सामाजिक असमंजस ।
कानून अब क्या कहता है ?
बच्चों के नामों में प्रयुक्त कान्जी (चीनी मूल के जापानी अक्षर) पारंपरिक और स्पष्ट उच्चारण वाले होने चाहिए। माता-पिता चाहे तो 3,000 मान्य कान्जी में से चुन सकते हैं, लेकिन अगर उन्होंने कोई अनोखा उच्चारण चुना है, तो उन्हें उसका तर्क देना होगा नहीं दे पाए, तो स्थानीय अधिकारी उन्हें कोई परंपरागत विकल्प सुझा सकते हैं।
नाम का सत्यापन पत्र देंगे
इस नए कानून के तहत हर जापानी नागरिक को एक पत्र भेजा जाएगा, जिसमें उनके नाम के ध्वन्यात्मक उच्चारण की पुष्टि मांगी जाएगी। अगर किसी को लगता है। कि उनका नाम गलत लिखा या पढ़ा जा रहा है, तो वे एक साल के भीतर सुधार के लिए आवेदन कर सकते हैं।
क्या हैं ‘कीरा – कीरा’ कल्चर वाले नाम?
‘कीरा कीरा’ नामों का मतलब होता है ऐसे नाम जो दिखने में भले ही ‘चमकदार और अनोखे लगें, लेकिन सुनने और समझने में मुश्किल खड़ी करते हैं। आमतौर पर यह नाम पॉप कल्चर से प्रेरित होते हैं। उदाहरण के लिए, ‘दाइया’ (डायमंड से प्रेरित) या ‘नाइकी’ (स्पोर्ट्स ब्रांड) जैसे नाम जापानी समाज में अब तक ट्रेंड बनते जा रहे थे लेकिन स्कूलों, अस्पतालों और दफ्तरों में ये नाम पहचान का संकट बनते हुए भ्रम और शर्मिंदगी की भी वजह बन रहे थे।