अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण सैन्य संघर्ष के दौरान पाकिस्तान की भूमिका और वहां के विशेषज्ञों के बयानों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है. पाकिस्तानी विशेषज्ञ कमर चीमा ने ईरान को संबोधित करते हुए एक वीडियो विश्लेषण जारी किया है. इसमें उन्होंने ईरान को परामर्श दिया है कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ बातचीत शुरू करने में बिल्कुल भी विलंब न करे. चीमा का तर्क है कि यदि ईरान ने देरी की, तो राष्ट्रपति ट्रंप अपनी सैन्य आक्रामकताओं को और अधिक बढ़ा सकते हैं. उल्लेखनीय है कि ईरान पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि पाकिस्तान द्वारा की जा रही कूटनीतिक पहल में उसकी कोई प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं है.
कमर चीमा ने अपने विश्लेषण में भारत का नाम लेकर ईरान को सचेत करने का प्रयास किया है. उन्होंने बिना किसी पुख्ता जानकारी के यह दावा किया कि भारत ने पूर्व में अमेरिका के साथ ट्रेड टैरिफ पर बातचीत के दौरान प्रक्रिया को धीमा करने की कोशिश की थी. चीमा के अनुसार, भारत ने अमेरिका की मांगों के बदले अपनी शर्तें बढ़ा दी थीं, जिससे वार्ता की प्रक्रिया बाधित हुई थी. वे ईरान को यह समझाना चाह रहे हैं कि वह भारत की तरह अपनी ‘डिमांड’ न बढ़ाए, अन्यथा अमेरिका हमले का दूसरा दौर शुरू कर सकता है. उनके बयानों में भारत की वैश्विक आर्थिक अहमियत और अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों के प्रति स्पष्ट ईर्ष्या देखी जा सकती है.
पाकिस्तान वर्तमान में स्वयं को एक वैश्विक मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा है. इस्लामाबाद का दावा है कि अमेरिका और ईरान के बीच एक उच्च स्तरीय बैठक उसके यहां आयोजित हो सकती है. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब तक किसी भी देश या आधिकारिक संगठन ने इस दावे की पुष्टि नहीं की है. पाकिस्तान ने हाल ही में सऊदी अरब, तुर्किए और मिस्र के विदेश मंत्रियों की एक संयुक्त बैठक भी बुलाई थी. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरान ने दो टूक शब्दों में कहा कि यह पाकिस्तान की अपनी व्यक्तिगत पहल है और तेहरान का इससे कोई लेना-देना नहीं है.
रणनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, कमर चीमा का यह कहना कि ईरान को राष्ट्रपति ट्रंप को ‘अंडरएस्टिमेट’ नहीं करना चाहिए, युद्ध के बढ़ते दबाव को दर्शाता है. चीमा का मानना है कि अमेरिकी सेना अपनी स्थिति कमजोर नहीं करना चाहती और यह युद्ध अभी कई हफ्तों तक खिंच सकता है. उन्होंने ईरान को सलाह दी है कि वह मोबाइल लॉन्च प्लेटफॉर्म्स और टनल सिस्टम के भरोसे रहने के बजाय कूटनीतिक समाधान खोजे. पाकिस्तान की इस ‘स्व-घोषित’ मध्यस्थता पर अमेरिका ने भी अब तक कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, जिससे पाकिस्तान की कूटनीतिक प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं.
स्थिति यह है कि पाकिस्तान हर संभव प्रयास कर रहा है कि वह इस महाशक्ति संघर्ष में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभरे. वह लगातार इस बात का प्रचार कर रहा है कि इस्लामाबाद ही वह स्थान है जहां शांति वार्ता संभव है. इसके विपरीत, जमीनी हकीकत यह है कि न तो वाशिंगटन और न ही तेहरान ने पाकिस्तान को इस संघर्ष में कोई औपचारिक जिम्मेदारी सौंपी है. कमर चीमा जैसे विशेषज्ञों के बयान केवल पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति और भारत के प्रति उनकी प्रतिस्पर्धात्मक मानसिकता को ही उजागर करते हैं. वैश्विक समुदाय इस समय पाकिस्तान के दावों के बजाय अमेरिका और ईरान की प्रत्यक्ष सैन्य गतिविधियों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहा है.